Monday, June 24, 2013

फिर भी कहते हो के ये दुनिया बड़ी हसीन है ?

किसी के टेबल पे 400 रुपये की थाली और किसी के हाथो मे 1 रोटी 
फिर भी कहते हो के ये दुनिया बड़ी हसीन है

कोई  पीता  है मिनरल वॉटर और कोई गटर का पानी 
फिर भी कहते हो ये दुनिया बड़ी हसीन हैं

पाल रखे है अनगिनत विदेशी कुत्ते किसीने और कोई अपनी रात काटता है कुत्तों के बगल मे सोके
फिर भी कहते हो ये दुनिया बड़ी हसीन है

आज में रोया जी भर के क्यूंकी मेरे पिता ने मुझे 100 रुपये देने से मना कर दिया लेकिन मेरी गली के भिखारी का बच्चा रोया क्यूंकी उसको खाना नहीं मिला 
फिर भी कहते हो ये दुनिया हसीन है

बचपन से सिखाया भगवान सबके पेट भरता है ताकि उसकी दुनिया सलामत रहे लेकिन फिर भी मरते हैं लाखों लोग भुखमरी से 
फिर भी कहते है दुनिया हसीन है 

थू है साला ऐसी दुनिया पे और उसके भगवान पे ..

Wednesday, June 6, 2012

तुम !!!



कैसे बताऊं मैं तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो, कैसे बताऊं
तुम धड़कानों का गीत हो
जीवन का तुम संगीत हो
तुम ज़िंदगी तुम बंदगी
तुम रोशनी तुम ताज़गी
तुम हर खुशी तुम प्यार हो
तुम प्रीत हो मनमीत हो
आँखों में तुम यादों में तुम
साँसों में तुम आहों में तुम
नींदों में तुम ख्वाबों में तुम
तुम हो मेरी हर बात में
तुम हो मेरे दिन रात में
तुम सुबाह में तुम श्याम में
तुम सोच में तुम काम में
मेरे लिए पाना भी तुम
मेरे लिए खोना भी तुम
मेरे लिए हसना भी तुम
मेरे लिए रोना भी तुम
और जागना सोना भी तुम
जाऊं कहीं देखूं कहीं
तुम हो वहाँ, तुम हो वहीं
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
तुम बिन तो मैं कुछ भी नहीं
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
मेरे लिए तुम कौन हो
यह जो तुम्हारा रूप है
यह ज़िंदगी की धूप है
चंदन से तरषा है बदन
बहती है जिस में एक अगन
यह शोखियां यह मस्तियाँ
तुमको हवाओं से मिली
ज़ूलफें घटाओं से मिली
होंठो में कलियाँ खिल गयी
आँखों को झीले मिल गयी
चेहरे में सिमटी चाँदनी
आवाज़ में है रागिनी
शीशे के जैसा अंग है
फूलों के जैसा रंग है
नदियों के जैसी चाल है
क्या हुस्न है क्या हाल है
यह जिस्म की रंगीनियाँ
जैसे हज़ारों तितलियाँ
बाहों की यह गोलाइयाँ
आँचल में यह परच्छाइयाँ
यह नगरियाँ है ख्वाब की
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
हालत दिल-ए-बेताब की
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
मेरे लिए तुम कौन हो
कैसे बताऊं, कैसे बताऊं
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
मेरे लिए तुम धरम हो
मेरे लिए ईमान हो
तुम ही इबादत हो मेरी
तुम ही तो चाहत हो मेरी
तुम ही मेरा अरमान हो
तकता हूँ मैं हर पल जिससे
तुम ही तो वो तस्वीर हो
तुम ही मेरी तक़दीर हो
तुम ही सितारा हो मेरा
तुम ही नज़ारा हो मेरा
युधयान में मेरे हो तुम
जैसे मुझे घेरे हो तुम
पूरब में तुम पच्चीं में तुम
उतार में तुम दक्षिण में तुम
सारे मेरे जीवन में तुम
हर पल में तुम हर चिर में तुम
मेरे लिए रास्ता भी तुम
मेरे लिए मंज़िल भी तुम
मेरे लिए सागर भी तुम
मेरे लिए साहिल भी तुम
मैं देखता बस तुमको हूँ
मैं सोचता बस तुमको हूँ
मैं जानता बस तुमको हूँ
मैं मानता बस तुमको हूँ
तुम ही मेरी पहचान हो
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
देवी हो तुम मेरे लिए
मेरे लिए भगवान हो
कैसे बताऊं मैं तुम्हे
मेरे लिए तुम कौन हो
कैसे................
-- किसी फिल्म से ली हुई लाइन

Tuesday, April 24, 2012

क्या तुझे वो सब कुछ याद है ??

कितने दिन गुज़र गए , कितनी बाते पुरानी  हो गयी . क्या अब भी वो सारी  बाते तुम्हे याद हैं ??

वो पतझड के मौसम के गिरे हुए पत्तों को इकठा करके मुझपे बरसाना ,
वो बारिश के मौसम में जबरदस्ती मुझे बूंदों कि झमाझम में धकेलना ,
क्या अब भी तुझे वो सब कुछ याद है ??

भूख लगने पे तेरा वो झूठमूठ का अजीब से चेहरे बनके रोना ,
और कुछ चाट मिलने पे तेरा जोर से चिल्लाना ,
क्या अब भी तुझे वो सब कुछ याद है ??

तेरे सामने किसी और कि खूबसूरती कि तारीफ़ करने में भी क्या मजा आता था ,
तेरे रूठे हुए चहरे पर मुस्कुराहट लाने में भी क्या मजा आता था ,
में तो एक एक पल को अभी भी जी रहा हूँ ,
लेकिन क्या तुझे वो सब कुछ याद है ??

Saturday, December 10, 2011

सपने



सपने ... ये सपने भी कितने अजीब हैं
पुरे ना हो तो दिल टूट जाता है और पुरे हो जाये तो दिमाग चढ जाता है

अक्सर सपने देखना अच्छा नही माना जाता
लेकिन कौन है इस दुनिया में जो इनको देखना छोड़ता है

किसकी सपने बड़े होते है किसीके छोटे
या यूँ कहू सब अपनी औकात के हिसाब से ये सपने देखते है

लेकिन मेरी तो इतनी औकात थी ना कि तेरे साथ अपने सपने देख सकूँ ..
तेरे साथ पूरी जिंदगी तो नही लेकिन जब तक जियूं , रह सकूँ ..

सोचता हूँ तू एक ख्वाहिश थी , जो पूरी ना हो सकी ..
लेकिन तू तो एक सपना थी जब तक सोता रहा खुश था , नींद टूटी और तू मुझसे दूर ..

ना तो मेरा सपना टुटा ना पूरा हुआ , बस कहीं खो गया जिसे में जिन्दी भर तलाशता रहूँगा ....



Wednesday, November 2, 2011

झूठी मुस्कुराहट का भी,अपना असर है !!!

झूठी मुस्कुराहट का भी,अपना असर है,
लगता है हमको,कुछ हमारी भी कदर है, .

उसकी मुस्कान का, कुछ मतलब न लगा लेना,
वो परी है जहाज़ की, दिल न उनसे लगा लेना,
.
सही कहा है, परियाँ जन्नत में होती हैं,
जन्नत आसमान में होती है,
तो, आसमान के जहाज़ की ये सुंदरियाँ,
क्या परियों से कम होती हैं,
.
चेहरा मुस्कुराता है, दिल न लगाती हैं वो,
बस दूर से ही,इंसान से नज़रें चुराती हैं वो,
.

खुदा ने हुश्न भी तो, आसमान में लटका दिया है,
इस गरीब को इस हाल में, एक फटका दिया है,
.

इतनी ख़ूबसूरती, जमीं पर पैर न धरती है,
नज़रों से लगता है, किसी और पर मरती है,
.
कितना बेदर्द नज़ारा था, हुश्न होते हुए बेदारा था,
बस एक तकल्लुफ था, हुश्न भी किये किनारा था,
.
कितना सहती हैं रोज़, किनके-किनके आखों कि बेहहाई,
गर पूछ लो इनसे, पता चल जाए सबके नज़र कि सफाई,
.
शायद ही किसी ने, नज़रें न मिलाई हों इनसे,
नजर से दिल मिलाने की, आरज़ू की हो इनसे,
.
इन हसीनों को भी, काम करना पड़ता है,
दूसरों का कितना, ख्याल रखना पड़ता है,
.
गर वक्त होता, थोडा अभी पीछे,
दीदार न होता, इनका यूँ दरीचे,
होती ये किसी, सूबे की मल्लिका,
न देख पाते यूँ, इनका ये सलीका,
.

पहरे में रहतीं, हर वक्त किसी के,
न गौर से देख पाते, यूँ जी भर के,
खुदा ने हम पर, मेहरबानी की है,
इनको न यूँ, किसी की रानी की है,
.

सहमी सी जिन्दगी का, चेहरे से झलक आता है,
किसी और के सामने, चेहरा यूँ जो मुस्कुराता है,
.

दिल में यूँ कितनी, कसमसाहट होती है तब,
कोई अनजान हसीना, मुस्कुरा देती है जब,
.

कई तो आदि हैं इसके, न देखते हैं उनकी तरफ,
कैसे छिपाए, दिल का अरमाँ, देखें उनकी तरफ,

.
बड़ा अजीब लगता है, हलचल सी मच जाती है,
समझ न पड़ता, दिल में झंकार से बज जाती है,

.

इस तरह शायद, बहुत किस्से बने होंगे,
इन हसीनाओं के, बहुत दीवाने बने होंगे..

www.speakingtree.com से साभार ..

Thursday, October 27, 2011

अच्छा लगता है :)




भी कुछ पाना कभी कुछ खोना अच्छा लगता है,

खुली आँखों में भविष्य के सपने संजोना अच्छा लगता है,

जब कभी भी मेरे दिल पर कोई गहरी चोट लगती है,

मुझे आँखे बंद कर बारिश में रोना अच्छा लगता है.



रौशिनी के आँचल में बिखरे अंधेरो को मैं चुनता सा,

कभी सोता हूँ, कभी सपनो में जगा, कभी उठा, कभी बैठा सा,

चलायमान इस दुनिया में रौशनी बिखेरना मुझे अच्छा लगता है,

बहुत ढूढ़ता हूँ मैं अपने आप को इस भीड़ में,

ऐसे इस भीड़ में खुद को खो कर भीड़ बन जाना मुझे अच्छा लगता है.



बड़ा बेसब्र सा रहा हूँ मैं इतने दिनों तक,मंजिल पाने को,

अब तो उस तक दौड़ कर जाना मुझे अच्छा लगता है,

आश्वाशन के समंदर में जीवन की नैया किस तरह खेई जाती है,

अब तो इसका राज सबको बताना मुझे बड़ा अच्छा लगता है.



आंसुवो के तेरे गालो पर लुढ़कने से पहले ,

किसी गम को तेरे नजदीक आने से पहले ,

उसे अपने पर ही आजमाना मुझे अच्छा लगता है.



रास्तो पर बिखरे सपने समेटता हूँ,

मैं भी कभी हँसता हूँ कभी रोता हूँ,

कभी मुझे भी किसी से लड़ने किसी से हँसने,बोलने का मन होता है,

मैं अब उन्हें अपने मित्र कहना पसंद करता हूँ, जिन्हें सब बताना ,

अपनी विपदा मिटाना , हसना ,गुनगुनाना,

लड़ना झगड़ना मिलना बिछड़ना सुनना, सुनाना

बुलाना ,मिलने जाना ,कभी रूठना कभी मनाना

अपने आप को उन पर मिटाना अच्छा लगता है...

Thursday, September 22, 2011

" काँच की बरनी (जार) और दो कप चाय "


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम
पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी (जार) और दो कप चाय " हमें याद आती है ।

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं .

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने
की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ .
आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे
- धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ
... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर
हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
.. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित
थोडी़ सी जगह में सोख ली गई .

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया


इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ..

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है .. अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे
पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है
... बाकी सब तो रेत है .
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया .
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।